भारत की आजादी का अमृत महोत्सव- 1857 से चले लम्बे स्वाधीनता संग्राम के उपरान्त भारत ने 15
अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त की। इस वर्ष हमारी आजादी को 75 वर्ष पूर्ण हुए।
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भारत अपनी संस्कृति और उपलब्धियों के गौरवशाली इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं के बलिदान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का स्मरण करते हुए ज्ञान, विज्ञान जैसे समस्त क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो रहा है
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भारत की वैश्विक महत्ता और आवश्यकता को समझने तथा उस पर गर्व करते हुए, नए विकसित भारत के निर्माण में जुट जाने का संकल्प लेते हुए हम 'भारत की आजादी का अमृत महोत्सव' मना रहे हैं।
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भारत की स्वतंत्रता के इस अमृत काल में युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द के ओजस्वी विचार अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
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भारत विश्वगुरू की प्रतिष्ठा को प्राप्त है- अपनी अध्यात्मिक शक्ति, गौरवपूर्ण संस्कृति, संस्कारों से ओतप्रोत अद्भुत सामर्थ्य, वैश्विक शांति और सौहार्द के लिए वसुधैव कुटुम्बकम् के भारतीय दर्शन के कारण
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भारत विश्वगुरू की प्रतिष्ठा को प्राप्त है- मानव कल्याण की प्रेरणा देने वाले सनातन धर्म, अमृत परिवार की संकल्पना एवं मूल्यपरक आचरण के कारण ।
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इस विश्व आदर्श की प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखने तथा भारतीय स्वतंत्रता को यथार्थ रूप से समझने के लिए भारत के प्रति स्वामी विवेकानन्द की समग्र दृष्टि और संदेश पर चिन्तन करने और उसका अनुसरण करने की आवश्यकता है।
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स्वामी विवेकानन्द के नर सेवा नारायण सेवा के भाव से मनुष्य निर्माण से राष्ट्र निर्माण के संदेश को विश्वजन तक पहुँचाने के ध्येय को धारण करते हुए विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना 07 जनवरी 1972 के दिन हुई।
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विवेकानन्द केंद्र आध्यात्म प्रेरित सेवा संगठन है जिसकी स्थापना सूर्योदय के समय विवेकानन्द शिला स्मारक कन्याकुमारी पर भगवा ध्वज फहराकर की गयी।
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माननीय श्री एकनाथ रानडे द्वारा स्थापित विवेकानन्द केन्द्र, तब से लगातार कन्याकुमारी मुख्यालय और देशभर में स्थापित 1331 शाखाओं व प्रकल्पों के माध्यम से कार्य करते हुए आज 07 जनवरी, 2023 को गौरवशाली 50 वर्ष पूर्ण कर रहा है
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भारत की आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर स्वामी विवेकानन्द के राष्ट्रचेतना जाग्रत करते हुए मानव मात्र के कल्याण की प्रेरणा देने वाले विचारों-संदेश राजस्थान प्रदेश के जन-जन तक पहुंचे ।
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इसी उद्देश्य को लेकर ही विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी राजस्थान प्रान्त द्वारा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सौजन्य से विवेकानन्द संदेश यात्रा राजस्थान का आयोजन किया गया।
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यह यात्रा स्वामी विवेकानन्द को विशिष्ट पहचान देने वाले खेतड़ी नगर से 19/11/22 से शुरू होकर राजस्थान में 7 संभागों के 33 जिलों में 75 स्थानों पर होते हुए 50 दिन की यात्रा पूर्ण कर, आज 7 जनवरी को जोधपुर में सम्पन्न हुई।
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स्वामी विवेकानन्द खेतड़ी, अलवर, जयपुर, अजमेर, सिरोही, आबू पर्वत आदि राजस्थान के जिन भी स्थानों पर आए थे, विशेष तौर पर उन सभी स्थानों पर भी विवेकानन्द संदेश यात्रा पहुंची।
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19 नवंबर को विवेकानन्द शिला स्मारक एवं विवेकानन्द केंद्र कन्याकुमारी के संस्थापक माननीय श्री एकनाथ रानडे की जयंती को साधना दिवस के रूप में मनाता है।
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यह वर्ष भारत की आजादी का अमृत काल, माननीय श्री एकनाथ रानडे की 108 वीं जयंती और विवेकानन्द केंद्र की स्थापना के 50 वर्ष मना रहा है।
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विवेकानन्द केन्द्र: अध्यात्म प्रेरित सेवा संगठन के सेवा में समर्पित 50 वर्ष
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विवेकानन्द संदेश यात्रा की राज्य आयोजन समिति में परम पूजनीय संत गोविंद देव गिरी जी, अनंत श्रीविभूषित जगद्गुरु निम्बार्काचार्य पीठाधीश्वर, परम श्रद्धेय स्वामी दत्तशरणानंद जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
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विवेकानन्द संदेश यात्रा के अंतर्गत मुख्य रूप से शोभा यात्रा, नुक्कड़ नाटक, अमृत परिवार संगोष्ठी, क्विज़ प्रतियोगिता, मैराथॉन, साइकिल रैली आदि कार्यक्रम आयोजित हुए।
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शोभा यात्रा, संगोष्ठी एवं मैराथॉन कार्यक्रम विशेष आकर्षण का केंद्र रहे।
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शोभा यात्रा में मातृशक्ति एवं युवा शक्ति केसरिया वेश में शोभा यात्रा की शोभा बढ़ाते रहे। साथ ही विभिन्न क्रांतिकारियों की झाँकिया भी मुख्य आकर्षण बनी रहीं।
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भारत के समाज की दशा दर्शाता नुक्कड़ नाटक का मंचन युवा कार्यकर्ताओं द्वारा पूरी यात्रा के दौरान रचनात्मक रूप से किया गया। जिसका प्रभाव जनमानस पर निश्चित रूप से आया।
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कोटा, डूंगरपुर व बीकानेर में आयोजित अमृत परिवार एवं वैचारिक संगोष्ठियों के माध्यम से विवेकानन्द संदेश यात्रा के उद्देश्य को सार्थक भी किया गया।
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उठो! जागो! युवा भारत! यह आवाहन लेकर विवेकानन्द संदेश यात्रा सम्पूर्ण राजस्थान में विचरण कर आज अपने अंतिम पड़ाव जोधपुर पहुंची।
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आज विवेकानन्द संदेश यात्रा के समापन कार्यक्रम में सायं 5 बजे बतौर मुख्य अतिथि केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री भारत सरकार श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत सम्मिलित होंगे।
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मुख्य वक्ता के रूप में विवेकानन्द केंद्र की अखिल भारतीय उपाध्यक्ष पद्मश्री सुश्री निवेदिता भिड़े मार्गदर्शन देंगी।
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विवेकानन्द केन्द्र वर्तमान में देश के 30 राज्यों में 224 जिलों में कार्य कर रहा है।
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यह सेवा कार्य 71 विभाग स्थान, 109 नगर स्थान, 129 कार्य स्थान, 616 प्रकल्प स्थान और 406 ग्राम स्थानों पर है।
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इस प्रकार कुल 1331 स्थानों पर अपने जीवनव्रती, सेवाव्रती, शिक्षार्थी व वानप्रस्थी के रूप में 180 पूर्णकालिक और 6737 दायित्ववान कार्यकर्ताओं के साथ निःस्वार्थ भाव से सेवारत है।
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कार्यपद्धति के चार आयाम : नयी पीढ़ी में जीवनमूल्यों और देशभक्ति भाव स्थापित करने के लिए संस्कार वर्ग का नियमित आयोजन होता है।
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वैचारिक स्पष्टता और ज्ञानवर्द्धन के लिए स्वाध्याय वर्ग का आयोजन होता है।
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योग जीवनपद्धति को जन- जन तक ले जाने के लिए योग वर्ग का आयोजन होता है।
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केन्द्र के कार्यकर्ताओं के सेवा संकल्प की पुष्टि हेतु केन्द्र वर्ग का आयोजन होता है।
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केन्द्र के पाँच वार्षिक उत्सव : भारत राष्ट्र की शक्ति, सामर्थ्य और गौरव के प्रति चेतना जाग्रत करने के लिए 25 दिसम्बर से 12 जनवरी तक समर्थ भारत पर्व एवं स्वामी विवेकानन्द जयंती उत्सव
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गीता अध्ययन के माध्यम से जीवन में श्रेष्ठता लाने के लिए मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को गीता जयंती उत्सव
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राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण भाव को पुष्ट करने के लिए माननीय एकनाथ रानडे की जयंती 19 नवम्बर को साधना दिवस उत्सव
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स्वामी विवेकानन्द ने सौहार्द और मानव कल्याण के प्रति सनातन धर्म की महत्ता का प्रथम उद्घोष शिकागो धर्मसंसद में 11 सितम्बर 1893 को किया,इसलिए विश्वबंधुत्व की भावना पर चिन्तन हेतु 11 सितम्बर को विश्वबंधुत्व दिवस उत्सव
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गुरू के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति और अनुसरण के लिए आषाढ़ पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा उत्सव मनाए जाते है।
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विविध शिविर व अन्य आयोजन: विवेकानन्द केन्द्र प्रति वर्ष 18 से 65 आयुवर्ग के लिए आध्यात्मिक शिविर, 18 से 60 आयुवर्ग के लिए योग शिक्षा शिविर व योग प्रमाणपत्र कोर्स का आयोजन करता है।
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युवावर्ग के लिए आवासीय प्रशिक्षण शिविर, व्यक्तित्व विकास शिविर, विमर्श, व्याख्यान व वैचारिक सम्मेलन, विद्यालय व महाविद्यालयों में स्वाध्याय प्रतियोगिताएं व एक दिवसीय शिविर इत्यादि का आयोजन भी होता है।
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शिक्षा सेवा - मनुष्य निर्माण व राष्ट्र निर्माण की शिक्षा प्रदान करने के ध्येय से अरूणाचल प्रदेश में 37,असम में 24,नागालैंड में 1,अंडमान में 10 कर्नाटक में 01 और तमिलनाडु में 02 कुल 75 विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय हैं।
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प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए अरूणाचल प्रदेश, असम के चाय बागान, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश व महाराष्ट्र में 200 आनन्दालय है।
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पूर्वप्राथमिक विद्यार्थियों के लिए तमिलनाडु, अरूणाचल प्रदेश व उड़ीसा में 195 बालवाड़ी हैं । #Vivekananda_Sandesh_Yatra
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अरूणाचल प्रदेश के निर्जुली में एक बीएड कॉलेज, बालिका शिक्षा प्रोत्साहन हेतु अरूणाचल प्रदेश में दो कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय तथा असम के न्यूमालीगढ़ में विवेकानन्द केन्द्र नर्सिंग स्कूल संचालित ।
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स्वास्थ्य सेवा - असम के न्यूमालीगढ़ में वि. के. न्यूमालीगढ़ रिफाइनरी लि. अस्पताल, मध्यप्रदेश के बीना में वि. के.भारत ओमान रिफाइनरी लि. अस्पताल, उड़ीसा के पारादीप में आइओसीएल वि. के. अस्पताल ।
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तमिलनाडु में 15 व झारखण्ड और महाराष्ट्र में एक-एक मेडिकल डिस्पेंसरी, अरूणाचल प्रदेश में दो मोबाइल चिकित्सा वैन तथा असम के तिनसुकिया में विवेकानन्द स्वास्थ्य सेवा सदन संचालित ।
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जनजाति व ग्राम्य कल्याण और कौशल विकास - असम, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उड़ीसा जैसे राज्यों में विवेकानन्द केन्द्र ग्राम्य कल्याण योजना, विवेकानन्द केन्द्र प्रशिक्षण व सेवा प्रकल्प
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विवेकानन्द केन्द्र अरूण ज्योति, महिलाओं के लिए विवेकानन्द केन्द्र व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्र, विवेकानन्द प्राकृतिक स्रोत्र विकास परियोजना (VIK-NARDEP), ग्रीन रामेश्वरम प्रोजेक्ट इत्यादि के द्वारा सेवाकार्य।
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सत्साहित्य: युवा भारती (अंग्रेजी), विवेकानन्द केन्द्र पत्रिका (अंग्रेजी), केन्द्र भारती (हिन्दी), विवेक विचार (मराठी), विवेक वाणी (तमिल), विवेक जागृति (असमी-अंग्रेजी) का प्रकाशन। #Vivekananda_Sandesh_Yatra
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विश्व भानु (मलयालम), विवेक सुधा (गुजराती) जैसी सामाजिक- सांस्कृतिक पत्रिकाओं सहित अनेक जनुपयोगी विषयक पुस्तकों व ग्रंथों का प्रकाशन ।
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मानवीय उत्कृष्टता हेतु प्रशिक्षण: विवकानन्द केन्द्र प्रतिष्ठान कन्याकुमारी, विवेकानन्द केन्द्र रामकृष्ण महासम्मेलन आश्रम नागदण्डी कश्मीर।
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विवेकानन्द केन्द्र कौशलम हैदराबाद, विवेकानन्द केन्द्र वैदान्तिक एप्लीकेशन इन योग एंड मैनेजमेंट (VK-VAYAM) सोलापुर महाराष्ट्र के माध्यम से सेवा ।
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सांस्कृतिक अध्ययन एवं शोध - विवेकानन्द इन्टरनेशनल फाउण्डेशन (VIF) नई दिल्ली, विवेकानन्द केन्द्र वैदिक विजन फाउण्डेशन (VKIC) गुवाहाटी असम।
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विवेकानन्द केन्द्र एकेडमी फॉर इण्डियन कल्चर, योग एंड मैनेजमेंट (VKAICYAM) भुवनेश्वर उड़ीसा के द्वारा कार्य।
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विवेकानन्द शिला स्मारक, स्वामी विवेकानन्द मण्डपम, एकनाथ रानडे समाधि, गौशाला, मोर अभ्यारण्य,रामायण दर्शनम-भारत सदनम, अराइज-अवेक, गंगोत्री, ग्रामोदय पार्क, वेंडरिंग मोंक जैसी प्रदर्शनियाँ ।
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राजस्थान में विवेकानन्द केन्द्र: 1972 में विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना के लगभग साथ ही राजस्थान प्रांत में भी केन्द्र कार्य का प्रारंभ हुआ।
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अजमेर, जोधपुर, जयपुर, भीलवाड़ा में केन्द्र की गतिविधियाँ अनवरत रूप से चल रही हैं। विवेकानन्द केन्द्र का हिन्दी प्रकाशन का कार्य जोधपुर से चलता है।
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पिछले कुछ समय से केन्द्र बांसवाड़ा जिले के जनजाति क्षेत्र में भी आनंदालयों के माध्यम से कार्यरत है। #Vivekananda_Sandesh_Yatra
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वर्तमान में राजस्थान प्रांत में 8 विभागों में 7 नगर स्थान, 7 कार्यस्थान, 21 ग्रामस्थान के साथ ही 10 आनंदालय, 1 सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र तथा जोधपुर में हिन्दी प्रकाशन विभाग के माध्यम से कार्य हो रहा है।
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विगत 50 वर्षों में राजस्थान प्रांत में विवेकानन्द केन्द्र ने अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हाथ में लिए-स्वामी विवेकानन्द के परिव्रजन के शताब्दी वर्ष में 1992 में सम्पूर्ण देश में विवेकानन्द भारत परिक्रमा का आयोजन हुआ।
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विवेकानन्द भारत परिक्रमा को राजस्थान में अभूतपूर्व प्रतिसाद मिला, परिक्रमा के पश्चात अनेक स्थानों पर केन्द्र कार्य प्रारंभ हुआ।
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सामूहिक सूर्यनमस्कार - विद्यालयीन छात्रों को सघन प्रशिक्षण देते हुए बड़ी संख्या में सामूहिक सूर्यनमस्कार कार्यक्रमों का आयोजन केन्द्र ने देशभर में अनेक स्थानों पर किया, इसका प्रारंभ हुआ राजस्थान प्रांत से।
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अजमेर, जोधपुर, भीलवाड़ा में हजारों छात्र ने एकत्रित आते हुए ऐसे सूर्यनमस्कार कार्यक्रमों में सहभागिता की। प्रांत में भीलवाडा में सर्वाधिक 11000 छात्रों ने एक साथ सूर्यनमस्कार महायज्ञ में भाग लिया है।
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महाविद्यालयीन छात्रों तथा युवाओं को जोड़ने की दृष्टि से वर्ष 2007 में विजय ही विजय कार्यक्रम हाथ में लिया गया। 950 से अधिक युवाओं का 5 दिवसीय आवासीय युवा प्रेरणा शिविर शाहपुरा (भीलवाड़ा) में सम्पन्न हुआ।
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मध्य भारत के जनजाति क्षेत्र में आनंदालय - बालकों के लिए विद्यालयीन शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा केन्द्र-प्रारंभ किए हैं। इस प्रकल्प के माध्यम से बालकों को मूलभूत शिक्षा के साथ उनमें आत्मविश्वास का जागरण होता है। विविध जनजाति क्षेत्र के साथ ही भीलवाड़ा, उदयपुर शहर में भी ऐसे आनंदालय चल रहे हैं।
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जोधपुर के गीता भवन में स्थित 'विवेकानंद केंद्र हिंदी प्रकाशन विभाग' विगत बीस से अधिक वर्षो से विविध हिंदी भाषी पुस्तकों के प्रकाशन के माध्यम अब तक 85 से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन कर चुका है।
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साथ ही विगत 44 वर्षों से पारिवारिक मासिक पत्रिका केंद्र भारती का नियमित प्रकाशन भी हो रहा है।
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स्वामी विवेकानन्द का राजस्थान से विशेष संबंध रहा, इसमें खेतड़ी नरेश अजीतसिंह से उनकी आत्मीयता सर्वविदित है। स्वामीजी यहाँ आए तो विविदिषानन्द बनकर थे, पर यह खेतड़ी ही था जिसने उन्हें विश्वविख्यात विवेकानन्द का नाम दिया।
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यहीं से स्वामीजी के अमरीका स्थित शिकागो की विश्व धर्म संसद में जाने की अधिकांश व्यवस्था भी हुई।
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यह भी राजस्थान की सभ्यता और संस्कृति का ही प्रभाव था कि विवेकानन्द ने अपनी पारम्परिक बंगाली व परिव्राजक सन्यासी की वेशभूषा के स्थान पर राजस्थानी साफा और चोगा कमरखी का आकर्षक वेश धारण किया, जो उनकी स्थायी पहचान बना।
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वे राजस्थानी परम्परानुसार भूमि पर बैठकर पट्टे पर ही भोजन किया करते थे। यह भी राजस्थान का ही सौभाग्य रहा कि रामकृष्ण मिशन जैसी जनकल्याणकारी संस्था की शुरूआत का प्रथम प्रयास भी यहीं से हुआ।
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विवेकानन्द स्वयं कहते थे कि 'यदि खेतड़ी के राजा न मिले होते तो शायद मैं वह सब नहीं कर पाता जो कर पाया हूँ।' इसीलिए उन्होंने अपने सहयोगी अखण्डानन्द आदि से भी राजस्थान से जुड़े रहने का आग्रह किया था।
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विवेकानन्द अपने परिव्राजक काल के दौरान प्रथमत: फरवरी 1891 में, दूसरी बार अप्रेल 1893 में और तीसरी बार नवम्बर 1897 में राजस्थान आए।
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प्रथम यात्रा के समय गेरूआ वस्त्र धारण किये, हाथों में दण्ड- कमण्डल और कांधे पर कम्बल डाले 28 वर्षीय युवा सन्यासी फरवरी 1891 में अलवर आए ।
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यहाँ महाराज मंगलसिंह को मूर्तिपूजा का महत्व बताया। अलवर से स्वामीजी जयपुर होते हुए अप्रेल 1891 में किशनगढ़ से अजमेर आए, दरगाह व तीर्थराज पुष्कर से पैदल ही प्रस्थान कर 14 अप्रेल 1891 में आबू पर्वत पहुँचे।
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वहाँ एक छोटी सी निर्जन गुफा में ध्यान-धारणा करने लगे। यहीं स्वामीजी की भेंट खेतड़ी के महाराजा अजीतसिंह से हुई और फिर तो वे दोनों अभिन्न मित्र ही बन गए।
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8 अगस्त, 1891 को खेतड़ी महल के उद्यान में नर्तकी के मुख से मीरां का मीठा भजन सुनकर भावविभोर स्वामीजी द्वारा माँ कहकर प्रणाम करने की अद्भुत भावधारा का गवाह भी राजस्थान बना ।
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खेतड़ी प्रवास के समय ही सीकर स्थित जीणमाता के दर्शन करके 28 अक्टूबर को अजमेर के लिए प्रस्थान किया। अजमेर में स्वामी विवेकानन्द हरविलास शारदा जी से मिले। श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ भी रहे। बाद में वे गुजरात चले गए।
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राजस्थान में विवेकानन्द की दूसरी यात्रा भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। दिसम्बर 1892 तक वे भ्रमण के दौरान शिकागो में होने वाली विश्व धर्म संसद में जाने के विषय में भी सोचते रहे।
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25, 26 व 27 दिसम्बर 1892 को स्वामीजी ने कन्याकुमारी समुद्र स्थित श्रीपाद शिला पर तीन दिन लगातार ध्यान कर भारत के उत्थान पर चिन्तन किया।
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खेतड़ी नरेश के मुंशी जगमोहन लाल 21 अप्रेल को उन्हें लेकर खेतड़ी आ गए। यहीं अजीतसिंह ने स्वामी विवेकानन्द को पानी के जहाज से अमरीका में शिकागो धर्मसंसद में भेजने की सम्पूर्ण व्यवस्थाएं की।
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अजीतसिंह जी ने नया राजस्थानी साफा और चोगा-कमरखी मंगवाया और आग्रहपूर्वक स्वामीजी को दिया। 10 मई को मुंशी जगमोहन लाल के साथ ही विवेकानन्द शिकागो यात्रा के लिए रवाना हुए।
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राजस्थान का यही साफा और चोगा पहनकर स्वामी विवेकानन्द ने विश्वभर में सनातन धर्म का परचम फहराया और फिर यही उनकी स्थायी पहचान बन गया।
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अमरीका से लौटने के उपरान्त अपनी तृतीय यात्रा में स्वामी विवेकानन्द नवम्बर 1897 के अंत में सर्वप्रथम अलवर आए, पाँच-छ: दिन रहकर वे जयपुर होते हुए खेतड़ी पहुँचे।
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यहाँ स्वामीजी का भव्य स्वागत-सत्कार हुआ और 11 दिसम्बर 1897 को एक बड़ी सभा का आयोजन भी हुआ। 21 दिसम्बर, 1897 को उन्होंने खेतड़ी से जयपुर के लिए प्रस्थान किया।
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बीच में झुंझुनु के बबाई और सीकर के थोई में भी विश्राम किया। अजीतसिंह जयपुर तक उन्हें विदा करने आए थे ।
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यहाँ दस दिन खेतड़ी हाउस में ठहरने के बाद स्वामीजी एक जनवरी, 1898 को किशनगढ़ आए। यहाँ से वे जोधपुर चले गए।
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1899 में राजस्थान में 19वीं सदी का भीषणतम अकाल 'छप्पनीया अकाल' पड़ा।
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उसी समय किशनगढ़ में स्वामीजी द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने उनके गुरूभाई स्वामी अखण्डानन्द की देखरेख में अकाल सहायता के रूप में सेवा कार्य प्रारम्भ किया।
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मिशन का राजस्थान में कार्य यहीं से शुरू हुआ था।
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युवा पीढ़ी से स्वामी विवेकानन्द का आह्वान- "तुम्हारे भविष्य को निश्चित करने का यही समय है। इसलिए मैं कहता हूँ कि अभी इस भरी जवानी में, इस नये जोश के जमाने में ही काम करो।
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काम करने का यही समय है, इसलिए अभी अपने भाग्य का निर्णय कर लो और काम में लग जाओ .आओ हम एक महान ध्येय को अपनाएं और उसके लिए अपना जीवन समर्पित कर दें।
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उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत; उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रूको मत
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स्वामीजी सदैव कहते थे-
"मेरा विश्वास युवा पीढ़ी-नयी पीढ़ी में है, मेरे कार्यकर्ता इन्हीं में से आएँगे और वे सिंहों की भांति समस्याओं का हल निकालेंगे।"
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जब सैंकड़ों नर-नारी पवित्रता की अग्नि से पूर्ण, ईश्वर में अविचल विश्वास से युक्त और हृदय में सिंह का साहस लिए, गरीब और पददलितों के प्रति सहानुभूति रखते हुए, भारत के कोने-कोने में मुक्ति, सहयोग, सामाजिक उत्थान और समानता का संदेश देतु हुए विचरण करेंगे, तब भारत विश्वगुरू बनेगा।
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क्या आप भी उन लोगों में से एक हैं, जिनके द्वारा स्वामीजी मातृभूमि - जगद्गुरू भारत के
लोगों को जाग्रत करने का मिशन पूरा करना चाहते थे ?
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क्या आप भी ऐसे ही युवा हैं ? .... क्या आप भी मनुष्य, समाज और राष्ट्र की सेवा करना चाहते हैं ?...
यदि हाँ तो आइये, अध्यात्म प्रेरित सेवा संगठन - विवेकानन्द केन्द्र आपकी प्रतीक्षा में है।
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यदि हाँ, तो आप विवेकानन्द केन्द्र की शिक्षा, संस्कृति और समाजोत्थान के लिए सजग प्रकल्पों और पूरे भारत में फैली केन्द्र शाखाओं से जुड़कर 'मनुष्य-निर्माण से राष्ट्र-निर्माण' के विविध सेवा प्रकल्पों के माध्यम से मानवता की सेवा कर सकते हैं।
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मैं भी विवेकानन्द। उठो! जागो! युवा भारत !
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आजादी का अमृत महोत्सव राष्ट्रीय चेतना के जनक स्वामी विवेकानन्द के संदेश बिना असंभव है। विवेकानन्द संदेश यात्रा, आजादी के अमृत महोत्सव को पूर्ण करती है।
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