गुरु गोविन्द सिंह tweets in हिन्दी | Guru govind singh tweets Hindi - हिंदी ट्वीटस
गुरु गोबिंद सिंह दसवें सिख गुरु, आध्यात्मिक गुरु, योद्धा, कवि और दार्शनिक थे | #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
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गुरु गोबिंद सिंह, गुरु तेग बहादुर (नौवें सिख गुरु) और माता गुजरी के इकलौते पुत्र थे। उनका जन्म पटना, बिहार में हुआ था। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा की पांच “क” की परंपरा की शुरुआत की
केश: बिना कटे केश
कंघा: एक लकड़ी की कंघी
कड़ा: कलाई पर पहना जाने वाला लोहे या स्टील का ब्रेसलेट
कृपाण: तलवार या खंजर
कचेरा: छोटी लताएँ #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे। उन्होंने सदा प्रेम, एकता, भाईचारे का संदेश दिया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह की मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं - भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह बाल्यकाल से ही सरल, सहज, भक्ति-भाव वाले कर्मयोगी थे। उनकी वाणी में मधुरता, सादगी, सौम्यता एवं वैराग्य की भावना कूट-कूटकर भरी थी। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु तेगबहादुर जी ने कहा कि देश-धर्म की रक्षा के लिए किसी महापुरुष को बलिदान करना होगा। पास ही बैठे उनके पुत्र गोबिंद राय ने कहा पिता जी आपसे बड़ा महान कौन होगा। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह जी ने वर्ष 1699 को बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह जी ने देश-धर्म की रक्षा के लिए अपने चार पुत्रों अजीत सिंह, जुझार सिंह, फतेह सिंह व जोरावर सिंह को बलिदान कर दिया। इस पर उन्होंने कहा कि - इन पुत्रन के सीस पर वार दिए सुत चार, चार मुए तो क्या हुआ जीवत कई हजार। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने शिष्यों को जीत का मंत्र दिया
चिडिय़न ते मैं बाज तुड़ाऊं,
सवा लाख से एक लड़ाऊं,
तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में 22 दिसंबर 1704 को सिरसा नदी के किनारे सिक्खों और मुग़लों के बीच एक युद्ध लड़ा गया जो इतिहास में चमकौर का युद्ध नाम से प्रसिद्ध है। इसमें 40 सिक्खों का सामना वजीर खान के नेतृत्व वाले 10 लाख मुग़ल सैनिकों से हुआ। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
“एक सिख के लिए संसार से विरक्त होना आवश्यक नहीं है तथा अनुरक्ति भी जरूरी नहीं है किंतु व्यावहारिक सिद्धांत पर सदा कर्म करते रहना परम आवश्यक है” – गुरु गोबिंद सिंह #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह युद्ध के बारे में कहते थे कि जीत सैनिकों की संख्या पर निर्भर नहीं, उनके हौसले एवं दृढ़ इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। जो नैतिक एवं सच्चे उसूलों के लिए लड़ता है, वह धर्मयोद्धा होता है तथा ईश्वर उसे विजयी बनाता है। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
स्वामी विवेकानंद जी ने गुरु गोबिंद सिंह के त्याग एवं बलिदान का विश्लेषण करने के पश्चात् कहा है कि ऐसे ही व्यक्तित्व के आदर्श सदैव हमारे सामने रहना चाहिए। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा पंथ से देश के चौमुखी उत्थान की व्यापक कल्पना थी। सिख दो तलवारें धारण करते हैं मीरी और पीरी। एक आध्यात्मत की प्रतीक है, तो दूसरी नैतिकता यानी सांसारिकता की। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह ने तथाकथित पिछड़ी जाति कहे जाने वाले वर्गों के लोगों को अमृतपान कराकर और फिर खुद उनके साथ अमृत छककर| सामाजिक एकात्मता, छुआछूत की बुराई के त्याग और मानस की ‘जात एक सभै, एक पहचानबो’ का महासंदेश दिया । #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिन्द सिंह सिख पंथ के दसवें गुरु थे। उनके पिता श्री गुरू तेग बहादुर के बलिदान के बाद गुरु गद्दी पर विराजमान हुए। उन्होंने देश-धर्म के लिए अपने पिता, पुत्र और अपना जीवन कुर्बान कर दिया। इसी कारण उन्हें सरबंसदानी भी कहा जाता है। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ श्री गुरु ग्रंथ साहिब को संपूर्ण किया तथा उन्हें सिख पंथ के ग्यारहवें गुरु रूप में सुशोभित किया। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह की मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं -भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
वर्ष 1699 की बैसाखी के दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। विभिन्न जातियों व देश के विभिन्न हिस्सों से आए अपने पांच शिष्यों को पांच प्यारे सुसज्जित किए। उन्हें अमृतपान कराया और खुद उनके हाथों अमृतपान कर सिंह बने। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे। उन्होंने सदा प्रेम, एकता, भाईचारे का संदेश दिया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
ख़ालसा पंथ सृजन के मौके पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने एक नया सूत्र दिया, "वाहे गुरूजी का ख़ालसा, वाहे गुरूजी की फतेह।" इस मौके पर उन्होंने ख़ालसाओं को ‘सिंह’ का नया उपनाम दिया और युद्ध की प्रत्येक स्थिति में सदैव तत्पर रहने के लिए पांच चिह्न धारण करना अनिवार्य घोषित किया। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह जी जिस उद्देश्य से संसार में आए उसको थोड़े समय में रहकर भी पूरा किया, जिसके बारे में आप ने ‘बचित्र नाटक’ में इस प्रकार बयान किया है- याही काज धरा हम जनमं।। समझ लेहु साधू सभ मनमं।। धरम चलावत संत उबारन।। दुसट सभन को मूल उपारन।। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरू गोबिंद सिंह के अनूठे व्यक्त्वि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है उनका सर्ववंशदानी होना। केवल पिता ही नहीं, उन्होंने अपने बेटों को शस्त्र प्रदान करते हुए कहा था कि "जाओ दुश्मन का सामना करो और शहीदी जाम को पियो।" यह बात सर्वविदित है कि उनके दो बड़े पुत्र चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए तो दो छोटे पुत्र सरहिंद की दीवारों में जिंदा ही चुनवा दिए गए थे। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
भाई दया सिंह ने जब चमकौर के युद्ध में शहीद हो जाने वाले गुरु गोबिंद सिंह के दो पुत्रों अजीत सिंह और जुझार सिंह के पार्थिव शरीर को चादर से ढकने की आज्ञा मांगी तो दशम गुरू का कहना था कि सभी मृत वीरों की देह को भी ढकने के बाद ही इन दोनों को ढका जाए। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
जब अपने चारों पुत्रों की शहादत से अंजान गुरूपुत्रन की मां ने गुरू जी से उनके विषय में पूछा, तो गुरू जी का उत्तर था, ‘इन पुत्रन के शीश पर वार दिए सुत चार, चार मुए तो क्या हुआ, जीवित कई हजार’ । देश के बलिवेदी पर कुर्बानी का ऐसा उदाहरण इतिहास में कोई दूसरा नहीं मिलता। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
एक महान आध्यात्मिक विभूति होने के साथ गुरू गोबिंद सिंह एक महान विद्वान व कलाप्रेमी साहित्यकार भी थे। वे बहुभाषाविद थे। उन्होंने 52 कवियों को अपने दरबार में नियुक्त किया था। उन्होंने प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन किया। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा के रूप में समाज को एक नया आयाम दिया। इसमें वर्ग-हीन, वर्ण-हीन, जाति-हीन व्यवस्था का निर्माण हुआ। उसमें से विद्वान योद्धा, धर्मात्मा, सेवक और संत आगे आए। अपने अनुयायियों को शूरवीरों में बदल दिया। इस रचना को आज हम खालसा पंथ के नाम से जानते हैं। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
स्वामी विवेकानन्द जी ने जिसका आदर्श हिन्दू समाज के सम्मुख रखा था, वे थे श्री गुरु गोबिन्द सिंह। उन्होंने कहा - ‘स्मरण रहे, यदि तुम अपने देश का कल्याण चाहते हो तो तुम में से प्रत्येक को श्री गुरु गोबिन्द सिंह बनना होगा।’ #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिन्द सिंह सभी प्रकार की सामाजिक विषमताओं का खण्डन करते हुए मनुष्य की जाति एक ही मानते हैं। वे किसी भी भेद को अस्वीकार करते हैं तथा सभी के अन्दर एक ही जोत की प्रतिष्ठा में उनकी आस्था है। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी कहते हैं कि सभी मनुष्य उस एक परमात्मा के ही स्वरूप हैं। इनके मध्य किसी भी प्रकार का भेद विचार करना अनुचित है। उनका कथन था - ‘मानस की जात सबै एकै पहचानबो।’ #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
‘चिड़ियन से मैं बाज तड़ाऊ, सवा लाख से एक लड़ाऊं, तब गोबिंद सिंह नाम कहाऊं’ का ओजस्वी नारा बुलंद करने वाले दशम गुरू के नेतृत्व में भारतीय इतिहास में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। उन्होंने उस युग की आतंकवादी शक्तियों के विनाश और धर्म व न्याय की प्रतिष्ठा के लिए एक नये पंथ के द्वारा भारतीय समाज को सैनिक परिवेश में ढाला था। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
सन् 1699 में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में आयोजित महासमागम में जब गुरु जी ने पांच शिष्यों के शीश मांगे तो सारा वातावरण सतश्री अकाल के जयकारों से गूंज उठा। इस मौके पर दयाराम, धर्म चंद, हिम्मत राय, मोहकम चंद, साहिबराम की प्रतीकात्मक बलि लेकर एक नये खालसा पंथ की बुनियाद रखी गई। ये पांचो प्यारे देश के प्रत्येक कोने में से थे। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
ख़ालसा पंथ सृजन के मौके पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने एक नया सूत्र दिया, "वाहे गुरूजी का ख़ालसा, वाहे गुरूजी की फतेह।" इस मौके पर उन्होंने ख़ालसाओं को ‘सिंह’ का नया उपनाम दिया और युद्ध की प्रत्येक स्थिति में सदैव तत्पर रहने के लिए पांच चिह्न धारण करना अनिवार्य घोषित किया। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह जी जिस उद्देश्य से संसार में आए उसको थोड़े समय में रहकर भी पूरा किया, जिसके बारे में आप ने ‘बचित्र नाटक’ में इस प्रकार बयान किया है- याही काज धरा हम जनमं।। समझ लेहु साधू सभ मनमं।। धरम चलावत संत उबारन।। दुसट सभन को मूल उपारन। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरू गोबिंद सिंह के अनूठे व्यक्त्वि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है उनका सर्ववंशदानी होना। केवल पिता ही नहीं, उन्होंने अपने बेटों को शस्त्र प्रदान करते हुए कहा था कि "जाओ दुश्मन का सामना करो और शहीदी जाम को पियो।" यह बात सर्वविदित है कि उनके दो बड़े पुत्र चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए तो दो छोटे पुत्र सरहिंद की दीवारों में जिंदा ही चुनवा दिए गए थे। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
भाई दया सिंह ने जब चमकौर के युद्ध में शहीद हो जाने वाले गुरु गोबिंद सिंह के दो पुत्रों अजीत सिंह और जुझार सिंह के पार्थिव शरीर को चादर से ढकने की आज्ञा मांगी तो दशम गुरू का कहना था कि सभी मृत वीरों की देह को भी ढकने के बाद ही इन दोनों को ढका जाए। #GuruGovindSingh
जब अपने चारों पुत्रों की शहादत से अंजान गुरूपुत्रन की मां ने गुरू जी से उनके विषय में पूछा, तो गुरू जी का उत्तर था, ‘इन पुत्रन के शीश पर वार दिए सुत चार, चार मुए तो क्या हुआ, जीवित कई हजार’ । देश के बलिवेदी पर कुर्बानी का ऐसा उदाहरण इतिहास में कोई दूसरा नहीं मिलता। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
एक महान आध्यात्मिक विभूति होने के साथ गुरू गोबिंद सिंह एक महान विद्वान व कलाप्रेमी साहित्यकार भी थे। वे बहुभाषाविद थे। उन्होंने 52 कवियों को अपने दरबार में नियुक्त किया था। उन्होंने प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन किया। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की सृजना कर एक ऐसे वर्ग को तैयार किया जो सदैव समाज और देशहित के लिए संघर्ष करता रहा। उन्होंने इनसानी मन का ऐसा बदलाव किया, जिसकी मिसाल और जगह नहीं दिखती। खालसा यानी जो मन, वचन और कर्म से शुद्ध हो और जो समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा के रूप में समाज को एक नया आयाम दिया। इसमें वर्ग-हीन, वर्ण-हीन, जाति-हीन व्यवस्था का निर्माण हुआ। उसमें से विद्वान योद्धा, धर्मात्मा, सेवक और संत आगे आए। अपने अनुयायियों को शूरवीरों में बदल दिया। इस रचना को आज हम खालसा पंथ के नाम से जानते हैं। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
स्वामी विवेकानन्द जी ने जिसका आदर्श हिन्दू समाज के सम्मुख रखा था, वे थे श्री गुरु गोबिन्द सिंह। उन्होंने कहा - ‘स्मरण रहे, यदि तुम अपने देश का कल्याण चाहते हो तो तुम में से प्रत्येक को श्री गुरु गोबिन्द सिंह बनना होगा।’ #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिन्द सिंह उस समय की परिस्थितियों के अध्ययन के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि अब इस अत्याचारी इस्लामी शक्ति से संघर्ष करने के लिए सशस्त्र सेना की आवश्यकता है जो सभी प्रकार के जातिगत भेदभावों से ऊपर तथा सम्पूर्ण देश की एकता में विश्वास करने वाली हो। इस्लाम से संघर्ष करने वाली यह शक्ति धर्माधिष्ठित हो तथा इसमें सम्मिलित होने वाला प्रत्येक सैनिक इस कार्य को ईश्वर द्वारा प्रदत्त दैवीय दायित्व समझकर अपना बलिदान देने को हर-क्षण तत्पर रहे। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
एक लेखक उस समय की परिस्थितियों में श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी की भूमिका के बारे में लिखते हैं कि- ‘यदि श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज की पवित्र मूर्ति अवतरित न हुई होती तो लोगों के अपने-अपने विविध धर्म पालन का अधिकार समाप्त होकर केवल इस्लाम ही यहाँ शेष रह जाता। सभी धर्मशास्त्र समाप्त हो जाते और केवल कुरान ही शेष रह जाती। चारों ओर पाप का ही बोलबाला होता और धर्म नष्ट हो जाता। न्याय का शासन, देवी-देवता, वेदों और पुराणों की कथाएँ तथा रीति-रिवाज भी सुरक्षित नहीं रहते।’ #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिन्द सिंह सभी प्रकार की सामाजिक विषमताओं का खण्डन करते हुए मनुष्य की जाति एक ही मानते हैं। वे किसी भी भेद को अस्वीकार करते हैं तथा सभी के अन्दर एक ही जोत की प्रतिष्ठा में उनकी आस्था है। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी कहते हैं कि सभी मनुष्य उस एक परमात्मा के ही स्वरूप हैं। इनके मध्य किसी भी प्रकार का भेद विचार करना अनुचित है। उनका कथन था - ‘मानस की जात सबै एकै पहचानबो।’ #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिन्द सिंह पृथ्वी पर अपने जन्म लेने के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए ‘श्री विचित्र नाटक’ में बतलाते हैं, ‘हम तो धर्म स्थापना, दुष्ट लोगों का संहार तथा संत लोगों की रक्षा करने हेतु ही आए हैं। इसी कारण से हमने इस धरा पर जन्म लिया है। इस बात को सभी साधु लोग समझ लें।’ #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने ‘श्री गुरुग्रन्थ साहिब’ जी का साक्षात् गुरु की देह की तरह पूजन का हुक्म देते हुए फरमाया कि प्रभु को पाने की अभिलाषा है तो ‘श्री गुरुग्रन्थ साहिब’ में निहित गुरुवाणी के शब्दों में उसे खोज लें। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
छोटे साहिबजादों को जिंदा दीवार में चिनवाने के पश्चात् दीवान टोडरमल ने नवाब से पार्थिव शरीर लेकर उनका अंतिम संस्कार करने की अनुमति मांगी। इस पर नवाब द्वारा रखी शर्त के अनुसार संस्कार के लिए स्वर्ण मोहरें बिछा कर भूमि प्राप्त की। गुरु परिवार के प्रति इस वफादारी के बदले बाद में नवाब सरहिंद ने दीवान टोडरमल की हवेली तथा उनकी शेष संपत्ति नष्ट करवा दी। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
जब भाई मोती राम मेहरा को माता जी तथा साहिबजादों के ठंडे बुर्ज में कैद होने की खबर मिली तो वह कोरे बर्तन में गर्म दूध भरकर ठंडे बुर्ज में पहुंच गया। वह लगातार तीन रात तक गर्म दूध पिलाने के लिए ठंडे बुर्ज में जाते रहे। बाद में जब नवाब को इस बात की जानकारी मिली तो उसने मोती राम मेहरा तथा उसकी वृद्ध माँ, पत्नी व इकलौते पुत्र को कोहलू में डालकर कर शहीद कर दिया। #दशमेश_पिता #GuruGovindSingh
गुरु गोबिंद सिंह
गुरु गोबिंद सिंह (5 जनवरी 1666 – 7 अक्टूबर 1708), गोबिंद राय, दसवें सिख गुरु, एक आध्यात्मिक गुरु, योद्धा, कवि और दार्शनिक थे।
जब उनके पिता, गुरु तेग बहादुर को इस्लाम में बदलने से इंकार करने के लिए सिर कलम कर दिया गया, तो गुरु गोबिंद सिंह को नौ साल की उम्र में सिखों के नेता के रूप में औपचारिक रूप से स्थापित किया गया, जो दसवें सिख गुरु बन गए। उनके चार पुत्रों की मृत्यु उनके जीवनकाल के दौरान दो युद्ध में हुई, दो को मुगल सेना द्वारा दीवार में चिनवा दिया गया था।
सिख धर्म में उनके उल्लेखनीय योगदान के बीच, 1699 में खालसा नाम के सिख योद्धा समुदाय की स्थापना और पाँच ‘क’, आस्था के पाँच लेख, जो हर समय खालसा सिख पहनते हैं, का परिचय देते हैं।
शुरूआती जीवन
गोबिंद सिंह, गुरु तेग बहादुर (नौवें सिख गुरु) और माता गुजरी के इकलौते पुत्र थे। उनका जन्म पटना, बिहार में हुआ था।
उनका जन्म का नाम गोबिंद राय था, और तख्त श्री पटना हरिमंदर साहिब नाम की एक तीर्थयात्रा उस घर के स्थल को चिन्हित करती है जहाँ उनका जन्म हुआ था और उन्होंने अपने जीवन के पहले चार साल बिताए थे।
1670 में, उनका परिवार पंजाब लौट आया, और मार्च 1672 में वे उत्तर भारत के हिमालय की तलहटी, शिवालिक श्रेणी, में चक्क नानकी में चले गए, जहां उन्हें स्कूली शिक्षा दी गई थी
गुरू
उनके पिता को इस्लाम में धर्मांतरण से इनकार करने और सिख धर्म और इस्लामी साम्राज्य के बीच चल रहे संघर्षों के लिए औरंगज़ेब के आदेशों के तहत 11 नवंबर 1675 को दिल्ली में सार्वजनिक रूप से गिरफ्तार किया गया था।
इस शहादत के बाद, युवा गोबिंद राय को सिक्खों ने 29 मार्च 1676 को वैसाखी पर दसवें सिख गुरु के रूप में स्थापित किया।
गुरु गोबिंद सिंह की शिक्षा उनके 10 वें गुरु बनने के बाद भी जारी रही, , वे पढ़ने और लिखने के साथ-साथ घुड़सवारी और तीरंदाजी और नियुद्ध भी करते थे
व्यक्तिगत जीवन
गुरु गोविंद सिंह की तीन पत्नियां थीं:
10 साल की उम्र में, उन्होंने 21 जून 1677 को आनंदपुर से 10 किमी उत्तर में बसंतगोह में माता जीतो से शादी की। इस जोड़ी के तीन बेटे थे: जुझार सिंह (जन्म 1691), जोरावर सिंह (जन्म 1696) और फतेह सिंह (जन्म 1699)।
17 साल की उम्र में, उन्होंने 4 अप्रैल 1684 को आनंदपुर में माता सुंदरी से शादी की। दंपति का एक बेटा, अजीत सिंह (जन्म 1687) था।
33 साल की उम्र में, उन्होंने 15 अप्रैल 1700 को आनंदपुर में माता साहिब देवान से शादी की। उनकी कोई संतान नहीं थी, लेकिन सिख धर्म में उनकी प्रभावशाली भूमिका थी। गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हें खालसा की माता के रूप में घोषित किया।
खालसा
1699 में, गुरु ने सिखों से वैशाखी पर आनंदपुर में एकत्र होने का अनुरोध किया। हाथ में तलवार के साथ गुरु ने भीड़ में से एक स्वयंसेवक को बुलाया जो अपने सिर का बलिदान करने के लिए तैयार है।
उनकी तीसरी आवाज पर दया राम (जिसे बाद में दया सिंह कहा जाता है) नाम का एक सिख आगे आया। गुरु उसे एक तंबू में ले गए और खून से सनी तलवार के साथ भीड़ में वापस लौट आए।
एक अन्य स्वयंसेवक को गुरु द्वारा बुलाया गया, जिसे फिर से तम्बू के अंदर ले जाया गया और कुछ समय बाद गुरु खूनी तलवार के साथ अकेले लौट आए।
उन्होंने तीन और स्वयंसेवकों के साथ प्रक्रिया जारी रखी, लेकिन पांचवें स्वयंसेवक के तम्बू के अंदर जाने के बाद, गुरु सभी पाँच स्वयंसेवकों के साथ बाहर आए।
उन्होंने उन्हें पंज प्यारे और सिख परंपरा में पहला खालसा कहा।
गुरु गोविंद सिंह ने खालसा की पांच “क” की परंपरा की शुरुआत की,
केश: बिना कटे केश |
कंघा: एक लकड़ी की कंघी।
कड़ा: कलाई पर पहना जाने वाला लोहे या स्टील का ब्रेसलेट।
कृपाण: तलवार या खंजर।
कचेरा: छोटी लताएँ।
सिख-मुगल युद्ध
गुरु गोबिंद सिंह के पिता, गुरु तेग बहादुर के वध के बाद, औरंगज़ेब के अधीन मुग़ल साम्राज्य सिख लोगों का एक बहुत बड़ा शत्रु था।
औरंगजेब ने गुरु गोविंद सिंह और उनके परिवार को भगाने का आदेश जारी किया। गुरू गोबिंद सिंह एक धर्म युध में विश्वास करते थे।
उन्होने इन उद्देश्यों के साथ चौदह युद्धों का नेतृत्व किया, लेकिन कभी भी बंदी नहीं बने और न ही किसी के पूजा स्थल को क्षतिग्रस्त किया।
शहीदी
गुरु की माता माता गुजरी और उनके दो छोटे पुत्रों को सरहिंद के मुस्लिम गवर्नर वज़ीर खान ने पकड़ लिया था।
5 और 8 वर्ष की आयु के उनके सबसे छोटे बेटों को इस्लाम में बदलने से मना करने के बाद उन्हें एक दीवार में जिंदा दफन करके मार दिया गया और माता गुजरी उनके पोतों की मौत की खबर सुनकर टूट गईं।
13 और 17 साल की उम्र में उनके दोनों बड़े बेटे भी मुगल सेना के खिलाफ दिसंबर 1704 की लड़ाई में मारे गए।
शहीदी
1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई, और तुरंत उसके बेटों के बीच एक उत्तराधिकार संघर्ष शुरू हुआ, जिन्होंने एक दूसरे पर हमला किया।
आधिकारिक उत्तराधिकारी बहादुर शाह थे, जिन्होंने गुरु गोबिंद सिंह को अपनी सेना के साथ भारत के दक्कन क्षेत्र में एक व्यक्ति के साथ सुलह के लिए आमंत्रित किया, लेकिन बहादुर शाह ने महीनों तक कोई भी चर्चा नही की।
मुस्लिम सेना के कमांडर और सरहंद के नवाब वजीर खान ने दो अफगानों, जमशेद खान और वासिल बेग को गुरु की हत्या के लिए नियुक्त किया,
दोनों ने गुपचुप तरीके से गुरु का पीछा किया जब उनके सैनिक भारत के दक्कन क्षेत्र में थे, उनके शिविर में प्रवेश किया। वे गुरु के पास पहुँच गए और जमशेद खान ने उन्हें नांदेड़ में एक घातक घाव से घायल कर दिया।
7 अक्टूबर 1708 को कुछ दिनों बाद गुरु की उनके घावों से मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने मुगलों के साथ सिखों के एक लंबे और कड़वे युद्ध को बढ़ावा दिया। उसके बाद बंदा सिंह बहादुर द्वारा बाज सिंह, बिनोद सिंह और अन्य लोगों के साथ संघर्ष जारी रहा।